प्रेम

               प्रेम


कभी खुद से पूछा, तो कभी तुमसे पूछा ,
लेकिन प्रेम की परिभाषा को समझ न पाया। 
कभी कलाकारों से पूछा ,तो कभी चित्रकारों से पूछा ,
लेकिन प्रेम को मैं एक रूप न दे पाया।
कभी अखबारों में ढूँढा , तो कभी इश्तेहारों में ढूँढा ,
लेकिन प्रेम पत्रों को किताबों में बंद पाया।
कभी जंगल में घूमा , तो कभी घाटी में छाना ,
लेकिन प्रेम की व्यापकता को क्षितिज के परे पाया।

कभी सूरतें निहारीं , तो कभी अंतर्मन में झाँका ,
लेकिन प्रेम के स्रोत को हृदय के अंदर पाया।
कभी संतों से पूछा , तो कभी दार्शनिकों से जाना ,
और प्रेम को ही मानवता का मूल पाया।

कभी बहती आँखों से पूछा ,
कभी सूनी रातों से पूछा ,
कभी खाली आंतो से पूछा ,
थक चुके उन हांथो से पुछा ,
और प्रेम को ही जीवन का एकमात्र सहारा पाया  ........


written by- Dk Patkar.

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