untitled-4

                      


जब वो घर से बाहर निकले सूरज छिप छिप जाए
सांझ सुबह सब एक ही लागे नैन कमल मुस्काए
व्यथित हृदय की मलिन भूमि में सरस सलिल खिल जाए
जीव जंतु सब नृत्य करें और वृक्ष लता लहराएं
जीवन की  इस अनुपम रचना को देख हरि हर्षायें
उसकी अनंत सुंदरता को देख रति आप लज्जाए
तीन लोक को हरने वाली सहज सकल दर्शाए
उसकी मेघ राग सी बोली सुनकर घट समूह छितराएं
दुर्गम वन से जब वो गुजरे शूल पुष्प बन जाएं
शीतल जल की पवित्र धारा सी वो मन के रोष मिटाए
जब वो घर से बाहर निकले सूरज छिप छिप जाए।
 
                         



Comments

Popular Posts