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मै जागा हूं क्यों,
मैं हारा हूं क्यों....
वक़्त की दहलीज पर आकर,
बेवक्त ठहरा हूं क्यों....
धड़कनें सहमी हुई सी क्यों हैं,
खौफ इकतला है क्यों...
जज्बात जकड़ रहे हैं मुझे,
हालात रुखसत हैं क्यों...
रोज़मर्रा का काम है ज़ीना,
फिर भी ये बेचैनी क्यों...
कवायद तो आसरे की करता हूं,
फिर भी बेपनहा हूं क्यों...
ज़ख्म ये कबके भर चुके हैं,
फिर भी दर्द होता है क्यों...
ऐलान हुआ है दरिंदगी की नुमाइश का,
फिर भी सन्नाटा पसरा है क्यों...
ज़हर कबका घुल चुका है हवा में,
फिर भी सब जिंदा हैं क्यों...
केकड़े सी काटती हैं वो चीखें,
कानो के पर्दे सलामत हैं क्यों...
मरने मारने पर उतारू हैं काफ़िले,
रियासत के मामले में दखल दूं तो क्यों...
ज़हन में नहीं रहती खुद शख्सियत अपनी,
किसी और को ज़हन में उतारूं तो क्यों...
चौराहे पर मारते हैं वो पत्थर,
जान उनके लिए दूं तो क्यों...
गुनाह माफ नहीं होंगे जानता हूं मेरे,
फिर भीतर के इस शैतान को मारूं तो क्यों...
लाशों को आग मिल रही है और मुझे ठंड,
ऐ खुदा मेरे साथ ये बेईमानी क्यों...
दरबदर भटकता हूं छुपते छुपाते ,
मेरी ज़िन्दगी की ऐसी कहानी क्यों...
आज भी संभाल के रखा है वो दस्तावेज,
तुमने लौट आने का वादा किया था ही क्यों...
खैर छोड़ो जाने दो,
ये सब तुम्हे बता ही रहा हूं क्यों............

#dk
#notes_bucket

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